तृणमूल कांग्रेस के 20 सांसदों के त्रिपुरा की तकरीबन गुमनाम पार्टी में शामिल हो जाने के साथ बगावत की प्रक्रिया पूरी हो चुकी है. लेकिन, महाराष्ट्र उद्धव ठाकरे के सामने एक बार फिर 2022 जैसी ही चुनौती और खतरा मंडरा रहा है. जो हालात हैं, सवाल यही उठ रहा है कि अगला शिकार कौन है?
काकोली घोष दस्तीदार के साथ तृणमूल कांग्रेस के 20 सांसद NCPI (नेशनलिस्ट सिटिजंस पार्टी ऑफ इंडिया) में शामिल हो चुके हैं. जैसा पहले ममता बनर्जी के साथ होता था, अब उद्धव ठाकरे के साथ भी होने लगा है. उद्धव ठाकरे ने मातोश्री में अपने लोकसभा सांसदों की बैठक बुलाई थी, लेकिन 9 में से 4 ही सांसद पहुंचे. 5 नदारद रहे, जिनके अलग अलग बहाने भी सामने आ गए हैं.
देश की राजनीति में सबसे कुख्यात ऑपरेशन लोटस माना जाता रहा है. लेकिन कोरोना वायरस की तरह अब इसके भी कई वैरिएंट सामने आने लगे हैं. कोरोना वायरस के नए वैरिएंट तो कम असरदार पाए जा रहे हैं, लेकिन ऑपरेशन लोटस के नए वैरिएंट ज्यादा खतरनाक साबित हो रहे हैं.
महाराष्ट्र में ऐसा ही चर्चित एक नाम सुना जा रहा है, ‘ऑपरेशन टाइगर’, जिसके कुछ शुरुआती लक्षण धीरे धीरे सामने भी आने लगे हैं. पश्चिम बंगाल में ऑपरेशन ‘खेला’ का टास्क तो पूरा हो ही चुका है, देखना है अगला टार्गेट कौन है?
सोशल मीडिया पर एक नया नाम भी सामने आया है, ‘ऑपरेशन डिलिमिटेशन’. दिलचस्प बात है कि यह नाम सभी वैरिएंट को कवर करता नजर आ रहा है. बड़ा सवाल यह है कि अगला टार्गेट कौन है?
- ऑपरेशन ‘खेला’ पूरा हो गया
ममता बनर्जी को छोड़कर तृणमूल कांग्रेस के 28 लोकसभा सांसदों में से 20 बागी सांसदों ने NCPI में शामिल हो जाने का ऐलान कर दिया है. लोकसभा स्पीकर ओम बिरला से मिलकर इन सांसदों ने विलय का आधिकारिक पत्र भी सौंप दिया है. टीएमसी के बागी सांसदों का नेतृत्व करने वाली काकोली घोष ने संसद में अलग बैठने की व्यवस्था किए जाने की भी मांग की है. बागी गुट के नेताओं में सीनियर नेता सुदीप बंद्योपाध्याय भी शुमार हैं.
अचानक 20 सांसदों को पाकर NCPI भी कुछ देर के लिए फूली नहीं समा रही होगा. जब तक कुछ और नहीं होता, तब तक तो ऐसा ही माना जाएगा. NCPI का मामला भी कम दिलचस्प नहीं है. त्रिपुरा के इस राजनीतिक दल का रजिस्टर्ड पता पश्चिम बंगाल के हावड़ा जिले के बानीपुर इलाके में है. 20 जनवरी, 2023 को पंजीकृत NCPI का चुनाव निशान पेन की निब है. पार्टी एक बार त्रिपुरा विधानसभा का चुनाव भी लड़ चुकी है. NCPI त्रिपुरा चुनाव में जो उम्मीदवार उतारे थे, उनमें से चार के नामांकन पत्र खारिज हो गए, और दो में से एक को 536 और दूसरे को 286 वोट मिले थे – लेकिन, छप्पर फाड़ कृपा बरसने के बाद अब NCPI लोकसभा की पांचवी और NDA की दूसरी सबसे बड़ी पार्टी बन चुकी है.
सुना गया है कि बागियों में एक हल्का सा मतभेद था. एक गुट चाह रहा था कि एकनाथ शिंदे और अजित पवार की तरह दावा कर असली टीएमसी पर काबिज हो जाया जाए. दूसरा गुट सब कुछ छोड़कर आगे बढ़ जाना चाहता था. सबको मालूम था कि जो भी हो रहा है, वह अस्थायी इंतजाम ही है. हर हाल में दल बदल कानून में फंसना नहीं है, और सदस्यता बचानी है. लिहाजा आम राय यही बनी कि सब एक साथ नया ठिकाना पकड़ लें, और आगे की रणनीति के लिए सही वक्त का इंतजार करें.
सवाल है कि तृणमूल कांग्रेस के बागी सांसदों ने एकनाथ शिंदे और अजित पवार की तरह पार्टी पर काबिज होने के बजाए NCPI में शामिल होने का फैसला क्यों किया? असल में, यह एक सुरक्षित रास्ता नजर आता है. किसी कानूनी लड़ाई की भी चुनौती नहीं है. तृणमूल कांग्रेस अपनी जगह बनी हुई है. फिलहाल तो ऐसा ही लगता है. क्योंकि, मुश्किल यह है कि ममता बनर्जी को समझ नहीं आ रहा होगा कि तृणमूल कांग्रेस छोड़ चुके सांसदों के खिलाफ क्या एक्शन लिया जाए, और कहां गुहार लगाई जाए?
- ऑपरेशन ‘टाइगर’ की आशंका
पश्चिम बंगाल में नया ‘खेला’ खत्म होने से पहले ही महाराष्ट्र के राजनीतिक गलियारों में बीते कुछ दिनों से ‘ऑपरेशन टाइगर’ की जोरदार चर्चा चलने लगी थी. चर्चा है कि उद्धव ठाकरे के हिस्से वाली शिवसेना के कुछ नेता और सांसद एकनाथ शिंदे की शिवसेना के नेताओं के संपर्क में हैं. हालांकि, डिप्टी सीएम एकनाथ शिंदे के साथी नेताओं ने ‘ऑपरेशन टाइगर’ जैसी किसी भी चर्चा या कोशिश को पूरी तरह खारिज किया है. शिवसेना प्रवक्ता राजू वाघमारे ने कहा कि ऐसा कोई अभियान नहीं चल रहा है, और न ही किसी को तोड़ने में उनकी पार्टी की कोई दिलचस्पी है. राजू वाघमारे का कहना है, अभी चुनाव नहीं हैं और सरकार के पास पहले से पूरा बहुमत मौजूद है. साथ ही, जिन सांसदों पर उंगली उठी है, वे भी खुद को उद्धव ठाकरे के साथ होने का दावा कर रहे हैं.
लोकसभा में फिलहाल शिवसेना (UBT) के 9 सांसद हैं, जबकि एकनाथ शिंदे वाली शिवसेना के पास 7 सांसद हैं. ‘ऑपरेशन टाइगर’ की चर्चा के बीच उद्धव ठाकरे ने मातोश्री में अपने लोकसभा सांसदों की बैठक बुलाई थी, और बैठक में जो हुआ उसके बाद तो ‘ऑपरेशन टाइगर’ का मामला महज अफवाह भी नहीं लग रहा है.
शिवसेना (उद्धव बाला साहेब ठाकरे) प्रमुख उद्धव ठाकरे की तरफ से 14 जून को मुंबई के मातोश्री में बुलाई गई इमरजेंसी मीटिंग में सभी 9 लोकसभा सांसदों को बुलाया गया था, लेकिन खबर आई है कि 5 सांसद बैठक से नदारद रहे. बैठक में महज 4 सांसद शामिल हुए, जबकि बाकियों के बारे में कुछ दावे और कुछ बहाने सामने आए हैं.
मातोश्री की बैठक में शामिल सांसद अनिल देसाई का कहना था, हम 4 सांसद शामिल हुए, और अन्य 5 लोग वर्चुअली शामिल हुए… क्योंकि उन्हें कुछ पर्सनल काम था. लेकिन, सभी 9 सांसद एकजुट हैं और पार्टी के साथ हैं… सभी अटकलें बेबुनियाद हैं.
शिवसेना (यूबीटी) नेता अरविंद सावंत ने बताया कि कई सांसद इमरजेंसी के चलते बैठक में नहीं पहुंच सके. इमरजेंसी भी अलग अलग तरह की बताई गई है. अरविंद सावंत ने कहा, एक सांसद के बच्चे की तबीयत खराब है, जिसका अस्पताल में इलाज कराया जा रहा है. एक सांसद की पत्नी की भी तबीयत खराब है… एक अन्य सांसद की बेटी की शादी है… सभी को इन स्थितियों को समझना चाहिए.
बेशक स्थितियों को समझना चाहिए. कुछ रिपोर्ट में वर्चुअल बैठक के दावे पर भी सवाल उठाए जा रहे हैं. सवाल उठाए जाने की वजह भी है. मेडिकल इमरजेंसी की बात और है, लेकिन अगर किसी के घर शादी है, तो क्या राजनीति के ऐसे नाजुक मोड़ पर बुलाई गई इमरजेंसी बैठक में शामिल होने का मौका नहीं निकाला जा सकता है. रिपोर्ट के अनुसार, किसी एक ने बताया है कि उनकी ट्रेन या फ्लाइट छूट गई, और एक ने ‘मेडिकल लीव’ का एप्लीकेशन लगा दिया था.
कुल मिलाकर देखें तो जो भी चर्चा है, अनायास नहीं है. अभी धधकती आग भले न दिखाई दे रही हो, लेकिन धुआं तो उठने ही लगा है.
- ऑपरेशन ‘डिलिमिटेशन’
पश्चिम बंगाल से महाराष्ट्र तक चल रही राजनीतिक उठापटक को सोशल मीडिया पर एक सीनियर पत्रकार ने एक नया नाम दिया है, ऑपरेशन ‘डिलिमिटेशन’. नाम देने की वजह भी समझी जा सकती है. जो कुछ भी हो रहा है, वह मॉनसून सेशन में एनडीए के लिए मददगार साबित होने वाला है. काकोली घोष दस्तीदार ने तो बोल ही दिया है कि वे लोग संसद में एनडीए का सपोर्ट करने वाले हैं.
बीजेपी के नेतृत्व वाली केंद्र की एनडीए सरकार की तरफ से संसद के मॉनसून सत्र में फिर से परिसीमन बिल लाए जाने की तैयारी है. विधानसभा चुनावों के बीच सरकार की तरफ से लाया गया 131वां संविधान संशोधन विधेयक जरूरी नंबर के अभाव में गिर गया था. अब अगर अलग अलग दलों से निकलकर सांसद एनडीए के समर्थन में आ जाते हैं, और दो-तिहाई बहुमत जुट जाता है तो परिसीमन बिल पास हो जाएगा – और, इसी कारण एक नया नाम ऑपरेशन ‘डिलिमिटेशन’ दिया गया है.
पिछले संसद सत्र में महिलाओं को 33 फीसदी आरक्षण देने के लिए कानून में संशोधन और परिसीमन विधेयक के समर्थन में 298 मत पड़े थे, जबकि विरोध में 230 वोट पड़े थे. 20 सांसदों का समर्थन से एनडीए का एक संभावित नंबर 312 तक पहुंचा माना जा रहा है.
अब अगर उद्धव ठाकरे की बैठक से गायब 5 सांसद भी मिल जाते हैं, तो यह नंबर 317 पहुंच सकता है. लेकिन, दो-तिहाई वाला जादुई नंबर तो अभी काफी दूर है. 3 सीटें खाली होने के कारण सदन की संख्या 540 है, ऐसे में दो-तिहाई बहुमत के लिए 362 की जगह 360 सदस्यों के वोट की ही जरूरत होगी.
जो हालात हैं, ऑपरेशन ‘डिलिमिटेशन’ के निशाने पर अगला नंबर किसका है, हर नजर उसी पर टिकी है. पहला खतरा तो तमिलनाडु में डीएमके पर ही मंडरा रहा है, और आने वाले चुनावी महत्व के हिसाब से देखा जाए तो समाजवादी पार्टी भी दायरे से बाहर हो, ऐसा नहीं लग रहा है. बाकी एनडीए को सपोर्ट करने की होड़ में कौन कौन शामिल है, धीरे धीरे तस्वीर साफ होने वाली है.

