अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें बढ़कर 21 सितंबर को 117 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई हैं। इसके बावजूद भारत में पेट्रोल और डीजल के खुदरा दाम स्थिर बने हुए हैं। इंडियामार्ट के आंकड़ों के मुताबिक, तेल कंपनियों ने खुद पर दबाव झेलते हुए करीब 8-9 रुपये प्रति लीटर का भार उठाया है।
नई दिल्ली: तेल की कीमतों में हालिया उछाल भारत की इंडस्ट्रियल सप्लाई चेन में दिखने लगा है। जबकि पेट्रोल और डीजल की रिटेल कीमतें ज्यादातर वैसी ही बनी हुई हैं। IndiaMART के डेटा से पता चलता है कि कई इंडस्ट्रियल इनपुट की कीमतों में तेजी से बढ़ोतरी हुई है। इसमें जुलाई और सितंबर के बीच पॉलीप्रोपाइलीन (PP) ग्रेन्यूल्स की कीमतों में सबसे ज्यादा उछाल आया है।
IndiaMART की सितंबर 2026 की मार्केटप्लेस इनसाइट्स के अनुसार, इसके प्लेटफॉर्म पर PP ग्रेन्यूल्स की मीडियन कोटेड कीमत जुलाई में 95 रुपये प्रति किलो से 32% बढ़कर 125 रुपये प्रति किलोग्राम हो गई। TMT स्टील बार की कीमत 13% बढ़कर 55,362 रुपये प्रति टन हो गई। वहीं, MS पाइप और स्ट्रेच फिल्म की कीमतों में 8-8% की बढ़ोतरी हुई।
यह डेटा IndiaMART पर सेलर्स की ओर से बताई गई कीमतों पर आधारित है। लिहाजा, यह पूरी अर्थव्यवस्था के आधिकारिक प्राइस इंडेक्स के बजाय बिजनेस इनपुट-कॉस्ट के दबाव का संकेत देता है।
सप्लाई चेन में कच्चे तेल की कीमतों का असर
PP की कीमतों में बढ़ोतरी खास तौर पर अहम है। कारण है कि पॉलीप्रोपाइलीन एक पेट्रोकेमिकल प्रोडक्ट है। यह कच्चे तेल और नेचुरल गैस फीडस्टॉक से बनता है। लिहाजा, कच्चे तेल की ज्यादा कीमतें प्लास्टिक, पैकेजिंग और दूसरे मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में लागत बढ़ा सकती हैं।
IndiaMART के फाउंडर और सीईओ दिनेश अग्रवाल ने कहा कि तेल की कीमतों का झटका भारत के बिजनेस पर पड़ा है। इसमें इंडस्ट्रियल इनपुट में महंगाई प्लास्टिक चेन के कुछ हिस्सों में ज्यादा है।
IndiaMART के डेटा से पता चलता है कि सभी प्रोडक्ट्स में यह बढ़ोतरी एक जैसी नहीं रही है। जहां PP ग्रेन्यूल्स की कीमतों में 32% की बढ़ोतरी हुई, वहीं PET बोतल की कीमतें 44 रुपये प्रति पीस पर स्थिर रहीं। दूसरी ओर कॉटन फैब्रिक की कीमतों में 8% की गिरावट आई। यह 65 रुपये प्रति मीटर हो गई।
रिटेल फ्यूल की कीमतें जस की तस
बिजनेस पर यह असर ऐसे समय में हो रहा है जब रिटेल फ्यूल की कीमतें काफी हद तक स्थिर हैं। IndiaMART ने कहा कि कच्चे तेल की कीमतों में तेजी से बढ़ोतरी हुई है। 21 सितंबर को भारत का क्रूड इंपोर्ट बास्केट 117 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया।
हालांकि, पेट्रोल और डीजल की कीमतें ज्यादातर वैसी ही बनी हुई हैं। IndiaMART के अनुसार, तेल कंपनियों ने अनुमानित 8-9 रुपये प्रति लीटर का बोझ खुद उठाया है। यह रोजाना लगभग 530 करोड़ रुपये के बराबर है। इसका मतलब है कि कच्चे तेल की ज्यादा कीमतों का असर पूरी इकॉनमी पर अलग-अलग तरह से पड़ रहा है।
मुमकिन है कि ग्राहकों को फ्यूल स्टेशनों पर कीमतों में उतनी बढ़ोतरी न दिखे। लेकिन, मैन्युफैक्चरर्स और दूसरे बिजनेस, जो पेट्रोलियम से जुड़ी चीजों पर निर्भर हैं, उन्हें कच्चा माल खरीदने के लिए ज्यादा पैसे खर्च करने पड़ सकते हैं।
बढ़ सकता है मार्जिन पर दबाव
IndiaMART का डेटा बड़े पैमाने पर इंडस्ट्रियल कीमतों के दबाव की ओर भी इशारा करता है। सितंबर के आंकड़ों से पता चला कि कई बिजनेस इनपुट की कीमतें बढ़ रही हैं। इनमें केमिकल, रबर और प्लास्टिक शामिल हैं।
मैन्युफैक्चरर्स के लिए मुख्य मुद्दा यह है कि क्या इनपुट की बढ़ी हुई लागत का बोझ ग्राहकों पर डाला जा सकता है। अगर तैयार उत्पादों की कीमतें लगभग स्थिर रहती हैं और कच्चे माल की लागत बढ़ती है तो कंपनियों के ऑपरेटिंग मार्जिन पर दबाव पड़ सकता है।
अगर बिजनेस बढ़ी हुई लागत को उत्पादों की कीमतों में शामिल करना शुरू कर देते हैं तो आगे चलकर इसका असर कंज्यूमर महंगाई पर भी पड़ सकता है।
इसलिए, IndiaMART की स्टडी तेल की कीमतों के असर के एक ऐसे रास्ते को उजागर करती है जो आसानी से दिखाई नहीं देता। वह है इकॉनमी पर असर डालने के लिए जरूरी नहीं कि तेल की कीमतों का झटका पेट्रोल पंप पर ही दिखे। यह कच्चा माल, मैन्युफैक्चरिंग लागत और सप्लाई चेन के जरिए बिजनेस और शायद ग्राहकों तक भी पहुंच सकता है।

