एक निवेशक का शेयरों में लगा 70 हजार रुपये का निवेश लगभग 1.93 करोड़ के लॉन्ग-टर्म कैपिटल गेन में बदल गया। इनकम टैक्स डिपार्टमेंट ने इसे एक बोगस पेनी-स्टॉक ट्रांजैक्शन माना और पूरी रकम को उनकी टैक्सेबल इनकम में जोड़ दिया। ITAT ने आयकर विभाग का केस रद्द कर दिया।
नई दिल्ली: मुंबई के एक निवेशक के लिए 70,000 रुपये का शेयर निवेश करीब 1.93 करोड़ रुपये के लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन में बदल गया। लेकिन इनकम टैक्स विभाग ने इस मुनाफे को वास्तविक मानने के बजाय इसे कथित तौर पर फर्जी पेनी स्टॉक ट्रांजैक्शन और फर्जी प्रविष्टि करार दिया। विभाग ने करीब 1.93 करोड़ रुपये की पूरी रकम को निवेशक की टैक्सेबल इनकम में जोड़ दिया। अब इस मामले में मुंबई ITAT ने टैक्स विभाग के फैसले को पलट दिया है।
यह मामला मुंबई के संजय कुमार मेहता से जुड़ा है और असेसमेंट ईयर 2015-16 का है। अपने आदेश में मुंबई आयकर अपीलीय न्यायाधिकरण (ITAT) ने 1,93,30,395 रुपये की टैक्स डिमांड के लिए की गई आय में बढ़ोतरी को हटा दिया।
मेहता के मुताबिक उन्होंने अप्रैल 2013 में Toyam Industries Ltd के 35,000 शेयर सिर्फ 70,000 रुपये में खरीदे थे। शुरुआत में उन्हें ये शेयर फिजिकल फॉर्म में मिले थे। बाद में अगस्त 2014 में उन्होंने अपने ब्रोकर के जरिए इन शेयरों को डीमैट में तब्दील कराया। इसके बाद सितंबर 2014 से फरवरी 2015 के बीच उन्होंने बीएसई पर इन शेयरों को 447 से 556 रुपये प्रति शेयर की कीमत के बीच बेच दिया।
शेयरों से हुआ लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन
इन शेयरों की बिक्री से मेहता के पूरे शेयर पोर्टफोलियो में करीब 2.14 करोड़ रुपये का लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन हुआ। इसमें अकेले टोयम इंडस्ट्रीज के शेयरों से करीब 1.93 करोड़ रुपये का लाभ शामिल था।
मेहता ने इनकम टैक्स विभाग के सामने कहा कि शेयरों की खरीद और बिक्री मान्यता प्राप्त स्टॉक एक्सचेंज के जरिए हुई थी और इन पर सिक्योरिटीज ट्रांजैक्शन टैक्स (STT) भी चुकाया गया था। शेयरों की बिक्री से मिली रकम ब्रोकर के जरिए उनके बैंक खाते में आई और बैंक स्टेटमेंट में भी दर्ज थी।
टैक्स विभाग को क्यों हुआ शक?
आयकर विभाग के ‘इंसाइट पोर्टल’ और जांच विंग की रिपोर्ट में तोयम इंडस्ट्रीज को उन 18 संदिग्ध पेनी-स्टॉक्स की सूची में शामिल किया गया था, जिनका इस्तेमाल फर्जी LTCG या STCL (शॉर्ट-टर्म कैपिटल लॉस) बनाने के लिए किए जाने का आरोप था।
असेसिंग ऑफिसर (AO) का तर्क था कि कंपनी के वित्तीय आंकड़े और फंडामेंटल्स इतने कमजोर थे कि शेयर की कीमतों में हुई इतनी भारी बढ़ोतरी को जायज नहीं ठहराया जा सकता।
विभाग ने धारा 68 के तहत 1.93 करोड़ रुपये के मुनाफे को अघोषित कैश क्रेडिट मानते हुए टैक्स लगा दिया, जिसे सीआईटी (अपील) ने भी बरकरार रखा था।
ITAT ने पलटा फैसला
बाद में मामला आईटीएटी पहुंचा। मेहता ने ITAT के सामने कहा कि उनकी तरफ से पूरे ट्रांजैक्शन के सबूत मौजूद हैं। उन्होंने शेयरों की खरीद और बिक्री से जुड़े दस्तावेज, डीमैट स्टेटमेंट, बैंक स्टेटमेंट, कॉन्ट्रैक्ट नोट्स, STT रसीद आदि रिकॉर्ड पेश किए।
उन्होंने यह भी बताया कि शेयरों को बेचने से पहले वे एक साल से ज्यादा समय तक उनके पास रहे थे। इसलिए उनके अनुसार यह वास्तविक शेयर निवेश और बिक्री का मामला था।
मुंबई ITAT ने मेहता की ओर से पेश किए गए दस्तावेजों की जांच की। ट्रिब्यूनल ने पाया कि उन्होंने बैंक स्टेटमेंट, डीमैट स्टेटमेंट आदि समेत कई दस्तावेजों के जरिए शेयरों की खरीद-बिक्री साबित की थी। सभी तथ्यों और उपलब्ध दस्तावेजों के आधार पर मुंबई ITAT ने इनकम टैक्स विभाग की ओर से लगाए गए अतिरिक्त 1,93,30,395 रुपये को हटाने का निर्देश दिया।

