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‘वनवासी’ बनाम ‘आदिवासी’: क्या राहुल गांधी की ‘न्याय’ राजनीति बदलेगी आदिवासियों की किस्मत?

विशेष रिपोर्ट: आदिवासी अस्मिता और न्याय की जंग

[अहमदाबाद/गांधीनगर – महानगर मेट्रो ब्यूरो]
गुजरात की पूर्वी पट्टी में रहने वाले लाखों आदिवासियों के लिए अब राजनीति केवल मतदान तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि यह अस्तित्व की लड़ाई बनती जा रही है। एक तरफ भाजपा का ‘विकास मॉडल’ है, तो दूसरी तरफ राहुल गांधी और कांग्रेस का ‘न्याय मॉडल’। ‘पाक्को गुजरात’ के विश्लेषण के अनुसार, आने वाले समय में आदिवासी वोट बैंक गुजरात की राजनीति की दिशा तय करने में निर्णायक भूमिका निभाएगा।
शब्दों का संघर्ष: पहचान की राजनीति
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि राहुल गांधी द्वारा ‘वनवासी’ शब्द के सामने ‘आदिवासी’ शब्द का जिस तरह से उपयोग किया गया है, उसने आदिवासी समुदाय के मानसपटल पर गहरी छाप छोड़ी है।

  • भाजपा का पक्ष: इस समुदाय को ‘वनवासी’ कहकर उन्हें वनों से जुड़ा हुआ मानती है।
  • राहुल गांधी का तर्क: ‘आदिवासी’ का अर्थ है इस धरती के मूल और प्रथम मालिक। यह पहचान उन्हें गौरव देने के साथ-साथ प्राकृतिक संसाधनों पर उनका पहला हक भी सुनिश्चित करती है।
    कांग्रेस की ‘न्याय’ राजनीति के 3 मुख्य स्तंभ
    राहुल गांधी की आदिवासी राजनीति मुख्य रूप से तीन मुद्दों पर केंद्रित है, जो सत्तापक्ष के लिए बड़ी चुनौती बन सकते हैं:
  • जल, जंगल और जमीन पर अधिकार: राहुल गांधी का सीधा आरोप है कि आदिवासियों की जमीनें कॉर्पोरेट मित्रों को सौंपी जा रही हैं। कांग्रेस का वादा है कि इन संसाधनों पर पहला हक आदिवासियों का ही होगा।
  • पेसा (PESA) कानून और ग्रामसभा की शक्ति: कांग्रेस शासित राज्यों की तर्ज पर गुजरात में भी ग्रामसभाओं को मजबूत करने और आदिवासियों को अपने क्षेत्र के विकास के लिए निर्णायक शक्ति देने की बात कही जा रही है।
  • जाति जनगणना (Caste Census): ‘जिसकी जितनी संख्या भारी, उतनी उसकी हिस्सेदारी’। बजट और योजनाओं में आदिवासियों को उनकी आबादी के अनुपात में हक दिलाने के लिए जाति जनगणना को कांग्रेस ने अपना ‘ब्रह्मास्त्र’ बनाया है।
    गुजरात का मैदान: विकास बनाम विस्थापन?
    गुजरात में ‘स्टैच्यू ऑफ यूनिटी’ जैसे बड़े प्रोजेक्ट्स से पर्यटन तो बढ़ा है, लेकिन स्थानीय आदिवासियों में अपनी जमीन खोने का डर और विस्थापन की पीड़ा भी देखी गई है। राहुल गांधी की ‘भारत जोड़ो न्याय यात्रा’ ने इसी पीड़ा को आवाज देने का प्रयास किया है। कांग्रेस अब आदिवासियों को केवल ‘वोट बैंक’ के रूप में नहीं, बल्कि देश के ‘मालिक’ के रूप में स्थापित करने की कोशिश कर रही है।

“आदिवासी इस देश के मालिक हैं, गुलाम नहीं। उन्हें उनका हक मिलना ही चाहिए।” – यह नारा आदिवासी क्षेत्रों में एक नई उम्मीद जगा रहा है।

निष्कर्ष और जनता का सवाल
क्या केवल शब्दों के बदलाव से आदिवासियों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति बदलेगी? क्या भाजपा के मजबूत संगठन और विकास के दावों के सामने कांग्रेस का यह ‘वैचारिक न्याय’ टिक पाएगा? इन सवालों के जवाब भविष्य की चुनावी राजनीति के गर्भ में छिपे हैं।
आपकी राय:
आदिवासियों के सर्वांगीण उत्थान के लिए कौन सी विचारधारा श्रेष्ठ है? ‘विकास’ या ‘न्याय’? अपनी प्रतिक्रिया हमें कमेंट बॉक्स में या हमारे व्हाट्सएप नंबर पर जरूर बताएं।
रिपोर्ट: डेस्क, महानगर मेट्रो

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