अहमदाबाद:
गुजरात पुलिस के इतिहास में एक ऐसा नाम, जिसे सुनते ही अपराधियों के पसीने छूट जाते हैं और राष्ट्रभक्तों का सीना गर्व से चौड़ा हो जाता है—वह नाम है डह्याजी गोबरजी वंजारा। साबरकांठा के एक छोटे से गाँव से शुरू हुआ यह सफर आज गुजरात के लाखों युवाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत बन गया है। ‘महानगर मेट्रो’ आज आपको बताएगा एक ऐसे रियल लाइफ हीरो की कहानी, जिसने केरोसिन के दीये की रोशनी में पढ़ाई कर आतंकवाद के खिलाफ जंग छेड़ी थी।
शून्य से सृजन: अभावों भरा बचपन और साइकिल का सपना
1 जून 1954 को हिम्मतनगर के ईलोल गाँव में एक अत्यंत साधारण किसान परिवार में जन्मे डह्याજી का बचपन भारी अभावों के बीच बीता। पिता गोबरजी एक गरीब किसान थे और पशुपालन (गधा पालन) के जरिए घर का गुजारा करते थे। उस दौर में अगर घर की सबसे कीमती चीज कोई थी, तो वह महज एक ‘साइकिल’ थी। लेकिन, दादा और पिता से मिले संस्कारों और शिक्षा की नींव ने डह्याजी के जीवन का मार्ग प्रशस्त किया।
संघर्ष और सहयोग: वडोदरा की लाइब्रेरी और पत्नी का साथ
गाँव की प्राथमिक पाठशाला से शुरू हुआ सफर हिम्मतनगर और फिर वडोदरा की सुप्रसिद्ध महाराजा सयाजीराव यूनिवर्सिटी (MSU) तक पहुँचा। पढ़ाई के दौरान जब आर्थिक तंगी आड़े आई, तब उनकी धर्मपत्नी गौरीबेन के परिवार ने हॉस्टल की फीस भरकर उनकी पढ़ाई जारी रखने में मदद की। डह्याजी सिर्फ पढ़ाई में ही अव्वल नहीं थे, बल्कि वे:
- एथलेटिक्स में गोल्ड मेडलिस्ट थे।
- एक कुशल घुड़सवार थे।
- साहित्य और कविता के गहरे शौकीन थे।
खाकी का रुआब: ‘जनता के पुलिस’ से ‘एनकाउंटर स्पेशलिस्ट’ तक
1980 में डायरेक्ट डी.एस.पी. के रूप में गुजरात पुलिस में शामिल होने के बाद वंजारा ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। 1987 में उन्हें आई.पी.एस. (IPS) कैडर मिला और यहीं से शुरू हुआ अपराधियों पर उनका कड़ा प्रહાર। - क्राइम कंट्रोल: उन्होंने शराब के अड्डों, हथियारों के रैकेट और हाईवे लुटेरों का सफाया किया।
- आतंकवाद के खिलाफ जंग: अहमदाबाद क्राइम ब्रांच और ATS (एंटी-टेररिस्ट स्क्वाड) के प्रमुख रहते हुए उन्होंने गुजरात को आतंकी खतरों से बचाने के लिए दिन-रात एक कर दिए।
- चर्चित केस: समीर खान, इशरत जहां और सोहराबुद्दीन जैसे हाई-प्रोफाइल मामलों में कार्रवाई के बाद उन्हें ‘एनकाउंटर स्पेशलिस्ट’ के रूप में पहचान मिली।
“गुजरात की जनता को सुरक्षित रखना ही मेरा परम धर्म है।” — यह वाक्य डी.जी. वंजारा की कार्यशैली का प्रतिबिंब रहा है।
जेल से जीत तक: एक अजेय योद्धा
कानूनी लड़ाइयों के कारण कई वर्षों तक जेल में रहने के बावजूद उनकी हिम्मत नहीं डिगी। साल 2014 में वे साबरमती जेल से ही सेवानिवृत्त (रिटायर) हुए, लेकिन अंततः सत्य की विजय हुई। 2020 में उन्हें सभी मामलों में क्लीन चिट मिली और सरकार ने उन्हें ‘पोस्ट-रिटायरमेंट आई.जी.’ के रूप में पदोन्नति (Promotion) देकर उनके सम्मान को पुनः स्थापित किया।
निष्कर्ष
आज डी.जी. वंजारा सिर्फ एक सेवानिवृत्त अधिकारी नहीं, बल्कि एक सामाजिक कार्यकर्ता और विचारक हैं। ईलोल के खेतों की धूल से उठकर आई.पी.एस. की वर्दी तक की उनकी यह यात्रा साबित करती है कि यदि इरादे नेक हों और मेहनत सच्ची हो, तो दुनिया की कोई भी ताकत आपको सफल होने से नहीं रोक सकती।
रिपोर्ट: टीम महानगर मेट्रो

